आगे-आगे बढ़ रहे हैं



श्री बालकवि बैरागी के पाँचवें काव्य संग्रह 
‘गौरव गीत’ का नौवाँ गीत

.....मैं काँग्रेस के मंच से हिन्दी मंच पर आया हूँ। सो, मैंने उस महान् संस्था के उपकार को नहीं भूलना चाहिये। मेरी नैतिकता मुझे इसके लिये हमेशा आगाह करती रहती है। .....मुझे लोकप्रियता देने में इन गीतों का बहुत बड़ा योगदान है। पूरे देश के आर-पार मेरा एक विशाल परिवार इन गीतों ने तैयार किया है। .......न इनका कोई साहित्यिक मूल्य है न इनमें कोई साहित्यिक बात ही है। फिर भी ये पुस्तकाकार छपे हैं। .....मेरे लिये यह जरूरी था कि इनको छपा कर आप तक पहुँचाऊँ। 


आगे-आगे बढ़ रहे हैं

हाथ में लिये हुए, महान् देश का निशान
आगे-आगे बढ़ रहे हैं, सेवादल के नौजवान

                        - 1 -

तन से, मन से औ’ वचन से, हम पवित्र बन रहे
त्याग-निष्ठा, कर्म-निष्ठा, सच्चरित्र बन रहे
ले के सेवा की मशाल, साधना औ’ स्वाभिमान
आगे-आगे बढ़ रहे हैं, सेवादल के नौजवान
हाथ में लिये हुए.....

                        
- 2 -

सोचना, समझना, उठना, चलना, सच्ची राह पर
मुश्किलों से जूझना, हँसना हर कराह पर
हँसते-गाते शान से, चला हमारा कारवान
आगे-आगे बढ़ रहे हैं, सेवादल के नौजवान
हाथ में लिये हुए.....

                        - 3 -

काँग्रेस ने बना के दे दी, हमको राह है
मुस्कुराती मंजिलों की ओर ही निगाह है
हम जमीं उठायेंगे, झुकायेंगे ये आसमान
आगे-आगे बढ़ रहे हैं, सेवादल के नौजवान
हाथ में लिये हुए.....

                        - 4 -

शिस्त का सबक लिया है, साधना सिंगार है
लक्ष्य की लगन लगी है, जोश है, निखार है
हौसला है, होश है? वतन के वास्ते है जान
आगे-आगे बढ़ रहे हैं, सेवादल के नौजवान
हाथ में लिये हुए.....

                        - 5 -

एक में अनेक हैं, अनेक हैं पर एक हैं
ये वतन नया बने, यही हमारी टेक है
एक माँ के लाल हैं, गा रहे हैं एक गान
आगे-आगे बढ़ रहे हैं, सेवादल के नौजवान
हाथ में लिये हुए.....

                        - 6 - 

कौन है जो रोक लेगा, अब अमन की राह को
हम नहीं सहन करेंगे, जंग के गुनाह को
अब जियेगा शान से, ईमान से सारा जहान
आगे-आगे बढ़ रहे हैं, सेवादल के नौजवान
हाथ में लिये हुए.....
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‘गौरव गीत’ - भूमिका, सन्देश, कवि-कथन, जानकारियाँ यहाँ पढ़िए।

‘गौरव गीत’ का आठवाँ गीत ‘हँसते-गाते’ यहाँ पढ़िए

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गौरव गीत - काँग्रेस सेवादल के लिए रचित गीतों का संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - पिया प्रकाशन, मनासा (म. प्र.)
आवरण - मोहन झाला, उज्जैन
कॉपी राइट - ‘कवि’ (बालकवि बैरागी)
प्रथम संस्करण - 1100 प्रतियाँ,
प्रकाशन वर्ष - 1966
मूल्य - 1.50 रुपये
मुद्रक - रतनलाल जैन,
पंचशील प्रिण्टिंग प्रेस, मनासा (म. प्र.) 
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यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। 
‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा की पोती। 
रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।




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