मिट्टी की अस्वीकृति

श्री बालकवि बैरागी के काव्य संग्रह 
‘वंशज का वक्तव्य’ की तीसरी कविता

यह संग्रह, राष्ट्रकवि रामधरी सिंह दिनकर को समर्पित किया गया है।



मिट्टी की अस्वीकृति

पौ का फटना
ही हो जिनके लिए सबसे बड़ी दुर्घटना
उनके लिए क्या अहमदाबाद और क्या पटना?
कुर्सी को बना लें जो अस्पताल की खाट
उनको मरीज मान कर
उनका इलाज करना
मासूमियत की पराकाष्ठा है!
सौ पचास मीलों के मार्च
लाख दस लाख के जुलूस.
बचकानी अराजकता
हिंसक अवज्ञा
और सम्पूर्ण क्रान्ति की प्रतिज्ञा
कुछ नहीं बिगाड़ सकती उनका!
वे तब तक सुरक्षित हैं
और रहेंगे
जब तक कि तुम खुद नहीं बदल लेते
अपने तौर तरीके।
मिट्टी जिसे अस्वीकार कर दे
उसे लाख उछालो तुम आकाश में
कुछ भी होना-जाना नहीं है
अफसाने तुम्हारे पास छप्पन करोड़ हो सकते हैं
पर एक भी पंक्ति का अपना खुद का तराना नहीं है!
उनकी फूटी नावों में भी
इसलिए बैठ जाते हैं लोग
कि तुम्हारी नाव में कोई मल्लाह ही नहीं है
तैरना तुम जानते नहीं
मौसम को पहचानते नहीं
और सफर की तो बिस्मिल्लाह ही नहीं है!
उस किनारे तक जाना तो ठीक
तुम इस किनारे को ही नहीं छोड़ पाओगे
तूफान तुम उठा सकते हो
रोक नहीं सकते
सदियों के रुख क्या मोड़ पाओगे?
काफिले, कारवाँ और प्रस्थान
समवेत स्वर में गाते हैं
हल्ला नहीं करते
क्या सरोकार है कोलाहल से उनका?
पता नहीं मैं तुम्हें समझा भी पा रहा हूँ या नहीं
पर शायद तुम यूँ समझो कि
तुम सब
अपने-अपने नशांे में धुत्त
मात्र बराती हो, केवल बराती
तुम्हारे पास अपना कोई दूल्हा नहीं है
हलवे-पूरी को मारो गोली
दाल-दलिया पकाने-भर को
दो ठीयों का छोटा-सा साधारण चूल्हा नहीं है!
दावत खाने वाले लोग
पत्तल का नहीं, पतीले का पता लगाते हैं
और किसी के न्यौते पर खूब सोच समझ कर
जाते हैं!
तुमने ग्राम भोज का नहीं
देश भोज का ढिंढोरा पीटा है
तुम्हारे न्यौते पर
अटाटूट उमड़ते, अरअराते नर-नारियों को
तुमने कभी देखा भी है?
दावत की तारीख को तुम
मुकदमे की पेशी तारीख समझ 
हर बार बढ़ा देते हो
और चुपचाप पसीना पोंछ कर अपनी
आँखें जमीन पर गड़ा लेते हो!
याद रखो
भूखा जव आता है तो दूध-पूत के
यशगान गाता हुआ आता है
पर यदि वह भूखा ही वापस लौटे तो
फिर सात-सात पीढ़ियों के सर्वनाश का
श्राप देता हुआ वापस जाता है!
उस पार जाने के लिए
फिर वही फूटी नाव
उस मक्कार मल्लाह की आँखों में
फिर वही दम्भ।
उसकी मनुष्यमार मूँछों पर
फिर वही ताव।
कौन कहता है कि
लोग उनसे आशावान हैं?
पर मैं कहता हूँ कि
लोग तुमसे निराश हैं।
वे यदि अन्धे, असफल और
अशालीन हैं
तो तुम अविश्वस्त हो!
तुम उद्वेलित कर सकते हो
आनन्दित नहीं।
तुम उत्तेजित कर सकते हो
सन्तुष्ट नहीं।
तुम्हारे पास संकल्प है
विकल्प नहीं।
इसीलिए मैं बार-बार कहता हूँ
कि तुम, जी हाँ तुम
जब तक तुम नहीं बदल लेते
अपने तौर तरीके
तय नहीं करते अपना दूल्हा
बताते नहीं अपना मल्लाह
तब तक
तुम इस व्यवस्था की एक कील भी नहीं हिला सकते
और नपुंसक सात क्या, सात हजार फेरे भी खा लें
तो भी अपना वंश नहीं चला सकते!
क्रान्ति को तुमने
बदजात, बड़बोली या छिनाल समझ लिया है
जो दिशाहीन, निर्वीर्य और आवारा आन्दोलनों को
वर लेगी?
और शादी के बाद वह चाहे जिससे जैसा कर लेगी?
माफ करना
वह वंशवती और यशवती होती है 1
क्रान्ति
यदि कह क्रान्ति है तो
फिर अपनी माँ से भी ज्यादा बड़ी
सती होती है ।
तुम प्रकाश का रोना रो रहे हो ना?
तुम सूरज का गिलाफ धो रहे हो ना?
तुम्हें पता है
सूरज के रथ में होते हैं सात घोड़े
जी हाँ, एक नहीं दो नहीं, पूरे के पूरे सात
वे भी घोड़े।
पर सूरज खुद नहीं हाँकता कभी अपना रथ
उसका काम है रथारूढ़ होना।
ऊगते ही जलना और जलते-जलते चलना
चलना और सतत चलना
जलना और सतत जलना ।
तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूँ
अरुण है सूरज के सारथी का नाम
वही खींचता है सातों घोड़ों की लगाम
पर तुम
मिट्टी की स्वीकृति से अनभिज्ञ योद्धा
कैसे-कैसे कमाल कर रहे हो
कि सूरज को तो जोत रहे हो जूड़ी में
और घोड़ों को ठूंस रहे हो रथ में
तुम सब के सब लगे हो उदयाचल की दुर्गत में।
अरुण की नियुक्ति को टाल रहे हो तुम
रथ को अँधेरे में हँकाल रहे हो तुम।
सच कह दूँ
बुरा मत मानना मेरे बीर!
कि तुम
पीढ़ी का विनाश
सूरज का सत्यानाश
और देश तथा क्रान्ति का महानाश
कर रहे हो
मन ही मन बोल रहे हो
अपनी अपनी जय
केवल रस्म अदाई के लिए
जय प्रकाश! जय प्रकाश! कर रहे हो
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वंशज का वक्तव्य (कविता संग्रह)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - ज्ञान भारती, 4/14,  रूपनगर दिल्ली - 110007
प्रथम संस्करण - 1983
मूल्य 20 रुपये
मुद्रक - सरस्वती प्रिंटिंग प्रेस, मौजपुर, दिल्ली - 110053



यह संग्रह हम सबकी ‘रूना’ ने उपलब्ध कराया है। 
‘रूना’ याने रौनक बैरागी। दादा की पोती। 
रूना, राजस्थान राज्य प्रशासनिक सेवा की सदस्य है और यह कविता प्रकाशन के दिन उदयपुर में अतिरिक्त आबकारी आयुक्त के पद पर पदस्थ है।

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